आज अनायास गंगा जी मे डुबकी लगाने का जी चाह दिया। नाँव मेँ बैठकर पार उतरे तो सुबह के 10 बजे होँगे। परन्तु दोस्तोँ के साथ जलक्रीडा करते हुए कब एक घन्टा बीत गया पता न चला । इतने मेँ मल्लाह ने आवाज दी "साहेब चलीँ !काम पे जाये के अहा।"
मैने पुछ लिया 'कहाँ काम करते हो,रुको थोडा और नहा लेँ।'
"बाबुजी दुर्गेश बाबु के यहाँ काम करता हुँ, देरी हो गई तो मार पडेगी"
मैँने चौँककर उससे पुछा " तुम्हारी उम्र कितनी है"?
"जी 13 साल" लडके ने बताया।
शाम को दुर्गेश बाबु मिले ,जो कि सरकारी दफ्तर मेँ कार्यरत हैँ। बातोँ ही बातोँ मेँ मैने कहा "भाई आप तो सरकारी मुलाजिम् हैँ ।बाल मजदुरी कराकर अपराध कर रहे हैँ।
दुर्गेश बाबु दांत निपोरते हुए बोले " राय साहब!मै तो उसे दो समय का भोजन और आशियाना देता हुँ। आखिर मै तो उसकी मदद करता हुँ।
आज हम सवा सौ करोड् हो चुके हैँ । विश्व की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था हमारी है। परन्तु लाखोँ बचपन ऐसेँ हैँ जिन्हेँ शिच्छा क्या भोजन तक नसीब नहीँ हो पाता है। और तो और दुर्गेश बाबु जैसे कई सरकारी मुलाजिम हैँ , जो रोटी और आश्रय देकर उनका बचपन छीन लेते हैँ। सरकार द्धारा बाल मजदुरी के खिलाफ उठाये गये कदम भी नाकाफी हैँ।
आखिरकार यह कथन भी तो भारत मेँ प्रचलित है"कानुन तो तोडने के लिए बनते हैँ"।
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
बुधवार, 20 अप्रैल 2011
Parent's
Ek choti bachhi apne Papa k sath ja rahi thi..Ek pul par paani bahut tezi se beh raha tha...
PAPA:- Beta daro mat,mera haath pakad lo.
BACHHI:-Nahi papa, aap mera haath pakad lo.
Papa (muskura kar):- Dono me kya antar hai beta..?
Bachhi:-Agar mai aapka haath pakdu aur achanak kuch ho jaye,to shayad mai aapka haath chhod du...LEKIN agar aap mera haath pakdenge, to mai jaanti hu ki chahe kuch bhi ho jaye,AAP MERA HAATH KABHI NAHI CHHODENGE..!!!
GREAT LOVE...!
Always remember ur 1st love is ur Parents..!Or whom u Trust...
PAPA:- Beta daro mat,mera haath pakad lo.
BACHHI:-Nahi papa, aap mera haath pakad lo.
Papa (muskura kar):- Dono me kya antar hai beta..?
Bachhi:-Agar mai aapka haath pakdu aur achanak kuch ho jaye,to shayad mai aapka haath chhod du...LEKIN agar aap mera haath pakdenge, to mai jaanti hu ki chahe kuch bhi ho jaye,AAP MERA HAATH KABHI NAHI CHHODENGE..!!!
GREAT LOVE...!
Always remember ur 1st love is ur Parents..!Or whom u Trust...
मंगलवार, 19 अप्रैल 2011
"खत्म होगा भ्रष्टाचार"
आज सुबह मेरे भाई ने अखबार से नजर हटाकर मुझसे पुछा "क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा?" मैने पुछा पहले यह बताओ कि लोकपाल विधेयक के बारे मेँ क्या जानते हो ? छोटे ने तपाक से कहा "कुछ खिलाओ तो बताता हुँ" मैने कहा....शायद इस जन्म मेँ यह खत्म न हो सकेगा । "क्युँ" भाई ने कहा मैने समझाया ...तुमने तो शुरुआत कर दी है। उसने कहा.."आप तो घर के हैँ । ये तो दुसरी बात है। "चोर चोरी की शुरुआत अपने घर से करता है" मेरे इस कथन से माहौल खामोश सा हो गया । शायद खामोशी मेँ छोटे भाई को उत्तर मिल गया था।
गुरुवार, 7 अप्रैल 2011
नैतिक जिम्मेदारी
अन्ना हजारे का प्रयास सराहनीय है परन्तु उनको गांधी जी के साथ तुलना करना जल्द्बाजी होगी । भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। भारत मेँ विधेयकोँ की कमी नहीँ है कानुन भी सश्क्त है ।आज एक रिक्शे वाला भी आपको तन्हाई मेँ पाता है तो लुटने का प्रयास करता है ।प्याज की किमत बढ जाने पर एक छोटा दुकानदार 10 रुपये के प्याज को बचाकर रख देता है और 60 रुपये किलो बेचता है। शुरुआत तो निचले स्तर से करनी चाहिए तभी यह संभव है। नेता तो हमारी रगोँ को पहचानकर उसके अनुरुप कार्य करता है । आजादी के बाद से भारत मेँ गैर सरकारी संगठनोँ तथा समाजसेवियोँ का अम्बार
सा लग गया है। परन्तु भ्रष्टाचार का स्तर घटने की बजाय बढ्ता ही गया है ।क्युँ? क्योँकि इन सभी जगहोँ पर नैतिक जिम्मेदारी का अभाव है।
अगर आम आदमी अपने स्तर से शुरु करे तो अवश्य ही ये विशालकाय रुपी जीव समाप्त हो जायेगा । ईन्दिरा गाँधी ने जबरन नसबन्दि कराई जिसका कि कोई सार्थक परिणाम नहीँ निकला क्योँकि जनता मेँ नैतिक जिम्मेदारी का अभाव था। आज हर वर्ग अपना परिवार छोटा चाहता है ।क्योँकि आज वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी एवँ जरुरतेँ समझता है जिसका कि 70 के दशक मेँ आभाव था ।
आज भगवान किशन रुपी उपदेश देने वाले हर गली और कुचोँ मेँ मिल जायेँगे। परन्तु अर्जुन जैसा आदेश पालक यदा कदा ही मिला करते हैँ।
"भारत अपना भ्रष्टाचार मुक्त हो जन जन का यह सपना है,
औरोँ को न देखेँ सोचेँ योगदान क्या अपना है"
सा लग गया है। परन्तु भ्रष्टाचार का स्तर घटने की बजाय बढ्ता ही गया है ।क्युँ? क्योँकि इन सभी जगहोँ पर नैतिक जिम्मेदारी का अभाव है।
अगर आम आदमी अपने स्तर से शुरु करे तो अवश्य ही ये विशालकाय रुपी जीव समाप्त हो जायेगा । ईन्दिरा गाँधी ने जबरन नसबन्दि कराई जिसका कि कोई सार्थक परिणाम नहीँ निकला क्योँकि जनता मेँ नैतिक जिम्मेदारी का अभाव था। आज हर वर्ग अपना परिवार छोटा चाहता है ।क्योँकि आज वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी एवँ जरुरतेँ समझता है जिसका कि 70 के दशक मेँ आभाव था ।
आज भगवान किशन रुपी उपदेश देने वाले हर गली और कुचोँ मेँ मिल जायेँगे। परन्तु अर्जुन जैसा आदेश पालक यदा कदा ही मिला करते हैँ।
"भारत अपना भ्रष्टाचार मुक्त हो जन जन का यह सपना है,
औरोँ को न देखेँ सोचेँ योगदान क्या अपना है"
बुधवार, 16 मार्च 2011
मुहल्ले की होली
साल भर बाद फिर लौट
आई होली,
लक्की धीरज चुन्नु लुड्डु ने
बनाई अपनी टोली॥
मोनु ने खरिदा गुलाल तो
सोनु को भाया रंग लाल
गौरव ने भरी पिचकारी
पापा पे ही डाल दी सारी
पान्डे जी को भी आया जोश
भाँग खाकर खो बैठे होश
राकेश से बोले होली है हुडदंग है
रंग देँगेँ सबको क्योँकि हम दबंग हैँ
इस होली का रंग निराला
दुश्मन को दोस्त बना डाला
अमित विनित जो रोज थे लडते
गले मिल आज रंग उडेलते
पुनित ललित की आइ टोली
दुर्गेश अम्बुज ने भी खेली होली
रंगोँ की फुहार मेँ
मिट गई सारी दुरी
आई होली,
लक्की धीरज चुन्नु लुड्डु ने
बनाई अपनी टोली॥
मोनु ने खरिदा गुलाल तो
सोनु को भाया रंग लाल
गौरव ने भरी पिचकारी
पापा पे ही डाल दी सारी
पान्डे जी को भी आया जोश
भाँग खाकर खो बैठे होश
राकेश से बोले होली है हुडदंग है
रंग देँगेँ सबको क्योँकि हम दबंग हैँ
इस होली का रंग निराला
दुश्मन को दोस्त बना डाला
अमित विनित जो रोज थे लडते
गले मिल आज रंग उडेलते
पुनित ललित की आइ टोली
दुर्गेश अम्बुज ने भी खेली होली
रंगोँ की फुहार मेँ
मिट गई सारी दुरी
मंगलवार, 15 मार्च 2011
"बेघर"
कल उस पार सडक पर मैनेँ देखा एक बेघर आँखोँ मेँ आँसुं डबडबाकर काँधे पे छोटी बहन को लेकर माँ की दवाई जेब मेँ भरकर शराबी बाप से मार खाकर चल रहा था बेबस होकर साहस कर मैनेँ उसे कुछ थमाया पर उसने ये कहकर उसको ठुकराया कि बाबुजी बेघर हुँ पर भिखारी नहीँ आज फिर उस पार सडक पर उसे देखा नजारा कुछ बदला बदला सा था शायद कुछ भीड् भी थी उसके साथ काँधे पर आज माँ थी शराबी बाप गम मेँ था आँखोँ मेँ आज भी आँसुं थे पर होँठ खामोश थे मेने फिर उसे कुछ देने का साहस किया इस बार भी वो न टुटा मेरी समझ मेँ आ गया कि वह बेघर है भिखारी नहीँ
गुरुवार, 10 मार्च 2011
परिवर्तन
युवाओँ के टोली के
समछ्,
किया भ्रष्टाचारियोँ ने
सर्मपण !!
कानोँ को छुकर ये
समीर,
कह रही हो रहा
परिवर्तन !!
हवाओँ मेँ जो थी
घुटन,
कम हो रही उसकी
तपन !!
भुखे नँगोँ को
ठिकाना,
होगा उनका भी
आशियाना !!
इतिहास अपने को
दोहराता है,
क्रान्ति के बीज हर बार
बो जाता है !!
लीबीया क्या पुरा
एशिया जल रहा,
सामाजिक ढांचे मे कुछ
परिवर्तन हो रहा !!
समछ्,
किया भ्रष्टाचारियोँ ने
सर्मपण !!
कानोँ को छुकर ये
समीर,
कह रही हो रहा
परिवर्तन !!
हवाओँ मेँ जो थी
घुटन,
कम हो रही उसकी
तपन !!
भुखे नँगोँ को
ठिकाना,
होगा उनका भी
आशियाना !!
इतिहास अपने को
दोहराता है,
क्रान्ति के बीज हर बार
बो जाता है !!
लीबीया क्या पुरा
एशिया जल रहा,
सामाजिक ढांचे मे कुछ
परिवर्तन हो रहा !!
"दल या दलदल"
दल बना या दलदल बना,
हाथ बना हाथी बना !
सब कहते हैँ हम साथी हैँ,
क्या इतनी सी बात काफी है !!
प्यार की ताशिर लेकर,
तलवार फिर क्युँ भोंकते !
हो क्या इतने टुकडे कम हुए,
क्युँ और इसको तोडते हो !!
मिट जायेँ जो देशपर,
क्या आज एक भी दल बचे !
अपनी दाल गलती रहे,
जनता चाहे मर मिटे !!
इस राजनीति ने तो,
अध्यात्म तक को खिचाँ है !
हाय अभागे लुट रहेँ,
कहर यह कैसा बरपा है !!
चलिए इस दलदल का तो,
रंग ही निराला है !
कुछ सोचकर युँ चुप हुँ,
शायद वक्त बदलने वाला है !!
हाथ बना हाथी बना !
सब कहते हैँ हम साथी हैँ,
क्या इतनी सी बात काफी है !!
प्यार की ताशिर लेकर,
तलवार फिर क्युँ भोंकते !
हो क्या इतने टुकडे कम हुए,
क्युँ और इसको तोडते हो !!
मिट जायेँ जो देशपर,
क्या आज एक भी दल बचे !
अपनी दाल गलती रहे,
जनता चाहे मर मिटे !!
इस राजनीति ने तो,
अध्यात्म तक को खिचाँ है !
हाय अभागे लुट रहेँ,
कहर यह कैसा बरपा है !!
चलिए इस दलदल का तो,
रंग ही निराला है !
कुछ सोचकर युँ चुप हुँ,
शायद वक्त बदलने वाला है !!
बुधवार, 9 मार्च 2011
आजादी
सब कहते हैँ कि,
आज हम स्वतंत्र हैँ !
ये आजादी तो मात्र,
उनकी है जो खेलते प्रपंच हैँ !!
आजादी के लिए जिन्होनेँ,
दी कुर्बानियाँ !
वास्तव मेँ वो तो रह गये,
बनकर कहानियाँ !!
स्वतंत्रता, गणतंत्र दिवस पर,
ध्वज फहराया जाता है !
अपनी काली करतुतोँ से,
इसको धुल चटाया जाता है !!
स्विस बैँकोँ मेँ भरकर धन,
ये स्वर्ग ले कर जायेँगे !
खाने को मिले जो इनको,
तोप से चारा तक खा जायेँगे !!
कवि "साहस" का है अनुमान,
होगा जनविद्रोह घमासान !
अंत मे छुपकर कहाँ जायेँगे,
गरिबोँ के हाथोँ निर्वाण पायेँगे !!
जिस तरह की बयार,
विश्व मेँ चल रही !
क्या बिना छुये,
देश को निकल जाएगी !!
पुजनियोँ! अब तो सम्हल जाओ,
आजाद हो चुके हैँ हम !
हमेँ आजादी पाने को,
मजबूर न कराओ !!
आज हम स्वतंत्र हैँ !
ये आजादी तो मात्र,
उनकी है जो खेलते प्रपंच हैँ !!
आजादी के लिए जिन्होनेँ,
दी कुर्बानियाँ !
वास्तव मेँ वो तो रह गये,
बनकर कहानियाँ !!
स्वतंत्रता, गणतंत्र दिवस पर,
ध्वज फहराया जाता है !
अपनी काली करतुतोँ से,
इसको धुल चटाया जाता है !!
स्विस बैँकोँ मेँ भरकर धन,
ये स्वर्ग ले कर जायेँगे !
खाने को मिले जो इनको,
तोप से चारा तक खा जायेँगे !!
कवि "साहस" का है अनुमान,
होगा जनविद्रोह घमासान !
अंत मे छुपकर कहाँ जायेँगे,
गरिबोँ के हाथोँ निर्वाण पायेँगे !!
जिस तरह की बयार,
विश्व मेँ चल रही !
क्या बिना छुये,
देश को निकल जाएगी !!
पुजनियोँ! अब तो सम्हल जाओ,
आजाद हो चुके हैँ हम !
हमेँ आजादी पाने को,
मजबूर न कराओ !!
सोमवार, 7 मार्च 2011
"तुम्हारा साथ"
अरमानोँ की इस अग्नि मेँ,
रहा तुम्हारा साथ प्रिये !
टुटकर रुठा बहुत मै तुमसे,
तुमने न छोडा साथ प्रिये !!
मेरी एक खुशी के खातिर,
तुमने तन मन दे डाला था!
छलकता रहा मैँ गागर मेँ जैसे,
तुमने मुझे उबारा था !!
तुम "दिव्य" स्वरुप स्वामिनी,
आँखोँ की शितलता प्रदायिनी
ईश्वर की है विशेष अनुकम्पा,
पर क्युँ तुमपे करता रहा शँका!!
दामन तो दुर्भाग्य ने थामा था,
फिर कहाँ तुम्हारा प्यार पाना था!
आज तुम्हारे आँसु मेरी आँखो से गिरते हैँ,
रात तो अन्जान सितारे भी डसते हैँ !!
हाय अभागा करता हुँ निवेदना,
आज जागी है इतनी संवेदना !
हो सके तो इतना स्विकार करना,
होकर मेरी मुझे तुम प्यार करना!!
आज कोई ख्वाहिश नहीँ गुजारिश है,
मैँ वही तुम्हारा साथ पाना चाहता हुँ !
फिर तुम्हारे आगोश मेँ डुबना ,
हाँ वही प्यार पाना चाहता हुँ !!
रहा तुम्हारा साथ प्रिये !
टुटकर रुठा बहुत मै तुमसे,
तुमने न छोडा साथ प्रिये !!
मेरी एक खुशी के खातिर,
तुमने तन मन दे डाला था!
छलकता रहा मैँ गागर मेँ जैसे,
तुमने मुझे उबारा था !!
तुम "दिव्य" स्वरुप स्वामिनी,
आँखोँ की शितलता प्रदायिनी
ईश्वर की है विशेष अनुकम्पा,
पर क्युँ तुमपे करता रहा शँका!!
दामन तो दुर्भाग्य ने थामा था,
फिर कहाँ तुम्हारा प्यार पाना था!
आज तुम्हारे आँसु मेरी आँखो से गिरते हैँ,
रात तो अन्जान सितारे भी डसते हैँ !!
हाय अभागा करता हुँ निवेदना,
आज जागी है इतनी संवेदना !
हो सके तो इतना स्विकार करना,
होकर मेरी मुझे तुम प्यार करना!!
आज कोई ख्वाहिश नहीँ गुजारिश है,
मैँ वही तुम्हारा साथ पाना चाहता हुँ !
फिर तुम्हारे आगोश मेँ डुबना ,
हाँ वही प्यार पाना चाहता हुँ !!
नारी
इस काठ रुपी समाज ने,
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!
वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!
परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!
जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!
वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!
परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!
जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!
रविवार, 6 मार्च 2011
रामराज्य का सपना
आज सुबह मैने देखा एक सपना,
देश मेँ था सत्य का बोल बाला
"सत्य" का ही साम्राज्य था अपना,
मानोँ चल रही हो रामराज्य की घटना !!
राम रुपी राजा बैठे थे पुरे होश मेँ ,
जनता उन्मुक्त थी गा रही थी पुरे जोश मेँ !
हम ने भी ईश्वर का धन्यवाद किया,
राम रुपी राजा से स्नेह और आशिर्वाद लिया
मुझे लगा अब बच्चे बेहतर शिछा पायेँगे,
मजदूर भी रोजी रोटी कमायेँगे !
लडकियाँ भी बैखौफ घरोँ से निकलेँगी ,
भ्रष्ट अफसरोँ पर कुछ नकेल तो कसेगी !!
माँ की ध्वनि से मेरी नीँद खुलती है ,
आँखे अनायास ही मुरझाये फुलोँ को तकती हैँ !
अट्टालिकाओँ से मेँ खपरैल पर गिरता हुँ,
रामराज्य का सपना गहरी स्वाँस मेँ छोडता हुँ!!
देश मेँ था सत्य का बोल बाला
"सत्य" का ही साम्राज्य था अपना,
मानोँ चल रही हो रामराज्य की घटना !!
राम रुपी राजा बैठे थे पुरे होश मेँ ,
जनता उन्मुक्त थी गा रही थी पुरे जोश मेँ !
हम ने भी ईश्वर का धन्यवाद किया,
राम रुपी राजा से स्नेह और आशिर्वाद लिया
मुझे लगा अब बच्चे बेहतर शिछा पायेँगे,
मजदूर भी रोजी रोटी कमायेँगे !
लडकियाँ भी बैखौफ घरोँ से निकलेँगी ,
भ्रष्ट अफसरोँ पर कुछ नकेल तो कसेगी !!
माँ की ध्वनि से मेरी नीँद खुलती है ,
आँखे अनायास ही मुरझाये फुलोँ को तकती हैँ !
अट्टालिकाओँ से मेँ खपरैल पर गिरता हुँ,
रामराज्य का सपना गहरी स्वाँस मेँ छोडता हुँ!!
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