मंगलवार, 15 मार्च 2011

"बेघर"

कल उस पार सडक पर मैनेँ देखा एक बेघर आँखोँ मेँ आँसुं डबडबाकर काँधे पे छोटी बहन को लेकर माँ की दवाई जेब मेँ भरकर शराबी बाप से मार खाकर चल रहा था बेबस होकर साहस कर मैनेँ उसे कुछ थमाया पर उसने ये कहकर उसको ठुकराया कि बाबुजी बेघर हुँ पर भिखारी नहीँ आज फिर उस पार सडक पर उसे देखा नजारा कुछ बदला बदला सा था शायद कुछ भीड् भी थी उसके साथ काँधे पर आज माँ थी शराबी बाप गम मेँ था आँखोँ मेँ आज भी आँसुं थे पर होँठ खामोश थे मेने फिर उसे कुछ देने का साहस किया इस बार भी वो न टुटा मेरी समझ मेँ आ गया कि वह बेघर है भिखारी नहीँ

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