गुरुवार, 10 मार्च 2011

"दल या दलदल"

दल बना या दलदल बना,
हाथ बना हाथी बना !
सब कहते हैँ हम साथी हैँ,
क्या इतनी सी बात काफी है !!

प्यार की ताशिर लेकर,
तलवार फिर क्युँ भोंकते !
हो क्या इतने टुकडे कम हुए,
क्युँ और इसको तोडते हो !!

मिट जायेँ जो देशपर,
क्या आज एक भी दल बचे !
अपनी दाल गलती रहे,
जनता चाहे मर मिटे !!

इस राजनीति ने तो,
अध्यात्म तक को खिचाँ है !
हाय अभागे लुट रहेँ,
कहर यह कैसा बरपा है !!

चलिए इस दलदल का तो,
रंग ही निराला है !
कुछ सोचकर युँ चुप हुँ,
शायद वक्त बदलने वाला है !!

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