इस काठ रुपी समाज ने,
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!
वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!
परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!
जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!
वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!
परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!
जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!
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