सोमवार, 7 मार्च 2011

नारी

इस काठ रुपी समाज ने,
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!

वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!

परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!

जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें