अन्ना हजारे का प्रयास सराहनीय है परन्तु उनको गांधी जी के साथ तुलना करना जल्द्बाजी होगी । भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। भारत मेँ विधेयकोँ की कमी नहीँ है कानुन भी सश्क्त है ।आज एक रिक्शे वाला भी आपको तन्हाई मेँ पाता है तो लुटने का प्रयास करता है ।प्याज की किमत बढ जाने पर एक छोटा दुकानदार 10 रुपये के प्याज को बचाकर रख देता है और 60 रुपये किलो बेचता है। शुरुआत तो निचले स्तर से करनी चाहिए तभी यह संभव है। नेता तो हमारी रगोँ को पहचानकर उसके अनुरुप कार्य करता है । आजादी के बाद से भारत मेँ गैर सरकारी संगठनोँ तथा समाजसेवियोँ का अम्बार
सा लग गया है। परन्तु भ्रष्टाचार का स्तर घटने की बजाय बढ्ता ही गया है ।क्युँ? क्योँकि इन सभी जगहोँ पर नैतिक जिम्मेदारी का अभाव है।
अगर आम आदमी अपने स्तर से शुरु करे तो अवश्य ही ये विशालकाय रुपी जीव समाप्त हो जायेगा । ईन्दिरा गाँधी ने जबरन नसबन्दि कराई जिसका कि कोई सार्थक परिणाम नहीँ निकला क्योँकि जनता मेँ नैतिक जिम्मेदारी का अभाव था। आज हर वर्ग अपना परिवार छोटा चाहता है ।क्योँकि आज वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी एवँ जरुरतेँ समझता है जिसका कि 70 के दशक मेँ आभाव था ।
आज भगवान किशन रुपी उपदेश देने वाले हर गली और कुचोँ मेँ मिल जायेँगे। परन्तु अर्जुन जैसा आदेश पालक यदा कदा ही मिला करते हैँ।
"भारत अपना भ्रष्टाचार मुक्त हो जन जन का यह सपना है,
औरोँ को न देखेँ सोचेँ योगदान क्या अपना है"
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