बुधवार, 9 मार्च 2011

आजादी

सब कहते हैँ कि,
आज हम स्वतंत्र हैँ !
ये आजादी तो मात्र,
उनकी है जो खेलते प्रपंच हैँ !!

आजादी के लिए जिन्होनेँ,
दी कुर्बानियाँ !
वास्तव मेँ वो तो रह गये,
बनकर कहानियाँ !!

स्वतंत्रता, गणतंत्र दिवस पर,
ध्वज फहराया जाता है !
अपनी काली करतुतोँ से,
इसको धुल चटाया जाता है !!

स्विस बैँकोँ मेँ भरकर धन,
ये स्वर्ग ले कर जायेँगे !
खाने को मिले जो इनको,
तोप से चारा तक खा जायेँगे !!

कवि "साहस" का है अनुमान,
होगा जनविद्रोह घमासान !
अंत मे छुपकर कहाँ जायेँगे,
गरिबोँ के हाथोँ निर्वाण पायेँगे !! 

जिस तरह की बयार,
विश्व मेँ चल रही !
क्या बिना छुये,
देश को निकल जाएगी !!

पुजनियोँ! अब तो सम्हल जाओ,
आजाद हो चुके हैँ हम !
हमेँ आजादी पाने को,
मजबूर न कराओ !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें