साल भर बाद फिर लौट
आई होली,
लक्की धीरज चुन्नु लुड्डु ने
बनाई अपनी टोली॥
मोनु ने खरिदा गुलाल तो
सोनु को भाया रंग लाल
गौरव ने भरी पिचकारी
पापा पे ही डाल दी सारी
पान्डे जी को भी आया जोश
भाँग खाकर खो बैठे होश
राकेश से बोले होली है हुडदंग है
रंग देँगेँ सबको क्योँकि हम दबंग हैँ
इस होली का रंग निराला
दुश्मन को दोस्त बना डाला
अमित विनित जो रोज थे लडते
गले मिल आज रंग उडेलते
पुनित ललित की आइ टोली
दुर्गेश अम्बुज ने भी खेली होली
रंगोँ की फुहार मेँ
मिट गई सारी दुरी
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