अरमानोँ की इस अग्नि मेँ,
रहा तुम्हारा साथ प्रिये !
टुटकर रुठा बहुत मै तुमसे,
तुमने न छोडा साथ प्रिये !!
मेरी एक खुशी के खातिर,
तुमने तन मन दे डाला था!
छलकता रहा मैँ गागर मेँ जैसे,
तुमने मुझे उबारा था !!
तुम "दिव्य" स्वरुप स्वामिनी,
आँखोँ की शितलता प्रदायिनी
ईश्वर की है विशेष अनुकम्पा,
पर क्युँ तुमपे करता रहा शँका!!
दामन तो दुर्भाग्य ने थामा था,
फिर कहाँ तुम्हारा प्यार पाना था!
आज तुम्हारे आँसु मेरी आँखो से गिरते हैँ,
रात तो अन्जान सितारे भी डसते हैँ !!
हाय अभागा करता हुँ निवेदना,
आज जागी है इतनी संवेदना !
हो सके तो इतना स्विकार करना,
होकर मेरी मुझे तुम प्यार करना!!
आज कोई ख्वाहिश नहीँ गुजारिश है,
मैँ वही तुम्हारा साथ पाना चाहता हुँ !
फिर तुम्हारे आगोश मेँ डुबना ,
हाँ वही प्यार पाना चाहता हुँ !!
रहा तुम्हारा साथ प्रिये !
टुटकर रुठा बहुत मै तुमसे,
तुमने न छोडा साथ प्रिये !!
मेरी एक खुशी के खातिर,
तुमने तन मन दे डाला था!
छलकता रहा मैँ गागर मेँ जैसे,
तुमने मुझे उबारा था !!
तुम "दिव्य" स्वरुप स्वामिनी,
आँखोँ की शितलता प्रदायिनी
ईश्वर की है विशेष अनुकम्पा,
पर क्युँ तुमपे करता रहा शँका!!
दामन तो दुर्भाग्य ने थामा था,
फिर कहाँ तुम्हारा प्यार पाना था!
आज तुम्हारे आँसु मेरी आँखो से गिरते हैँ,
रात तो अन्जान सितारे भी डसते हैँ !!
हाय अभागा करता हुँ निवेदना,
आज जागी है इतनी संवेदना !
हो सके तो इतना स्विकार करना,
होकर मेरी मुझे तुम प्यार करना!!
आज कोई ख्वाहिश नहीँ गुजारिश है,
मैँ वही तुम्हारा साथ पाना चाहता हुँ !
फिर तुम्हारे आगोश मेँ डुबना ,
हाँ वही प्यार पाना चाहता हुँ !!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें