युवाओँ के टोली के
समछ्,
किया भ्रष्टाचारियोँ ने
सर्मपण !!
कानोँ को छुकर ये
समीर,
कह रही हो रहा
परिवर्तन !!
हवाओँ मेँ जो थी
घुटन,
कम हो रही उसकी
तपन !!
भुखे नँगोँ को
ठिकाना,
होगा उनका भी
आशियाना !!
इतिहास अपने को
दोहराता है,
क्रान्ति के बीज हर बार
बो जाता है !!
लीबीया क्या पुरा
एशिया जल रहा,
सामाजिक ढांचे मे कुछ
परिवर्तन हो रहा !!
समछ्,
किया भ्रष्टाचारियोँ ने
सर्मपण !!
कानोँ को छुकर ये
समीर,
कह रही हो रहा
परिवर्तन !!
हवाओँ मेँ जो थी
घुटन,
कम हो रही उसकी
तपन !!
भुखे नँगोँ को
ठिकाना,
होगा उनका भी
आशियाना !!
इतिहास अपने को
दोहराता है,
क्रान्ति के बीज हर बार
बो जाता है !!
लीबीया क्या पुरा
एशिया जल रहा,
सामाजिक ढांचे मे कुछ
परिवर्तन हो रहा !!
परिवर्तन होना जरूरी है ........क्रांतिकारी कविता .....बधाई
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