बुधवार, 16 मार्च 2011

मुहल्ले की होली

साल भर बाद फिर लौट
आई होली,
लक्की धीरज चुन्नु लुड्डु ने
बनाई अपनी टोली॥

मोनु ने खरिदा गुलाल तो
सोनु को भाया रंग लाल
गौरव ने भरी पिचकारी
पापा पे ही डाल दी सारी

पान्डे जी को भी आया जोश
भाँग खाकर खो बैठे होश
राकेश से बोले होली है हुडदंग है
रंग देँगेँ सबको क्योँकि हम दबंग हैँ

इस होली का रंग निराला
दुश्मन को दोस्त बना डाला
अमित विनित जो रोज थे लडते
गले मिल आज रंग उडेलते

पुनित ललित की आइ टोली
दुर्गेश अम्बुज ने भी खेली होली
रंगोँ की फुहार मेँ
मिट गई सारी दुरी

मंगलवार, 15 मार्च 2011

"बेघर"

कल उस पार सडक पर मैनेँ देखा एक बेघर आँखोँ मेँ आँसुं डबडबाकर काँधे पे छोटी बहन को लेकर माँ की दवाई जेब मेँ भरकर शराबी बाप से मार खाकर चल रहा था बेबस होकर साहस कर मैनेँ उसे कुछ थमाया पर उसने ये कहकर उसको ठुकराया कि बाबुजी बेघर हुँ पर भिखारी नहीँ आज फिर उस पार सडक पर उसे देखा नजारा कुछ बदला बदला सा था शायद कुछ भीड् भी थी उसके साथ काँधे पर आज माँ थी शराबी बाप गम मेँ था आँखोँ मेँ आज भी आँसुं थे पर होँठ खामोश थे मेने फिर उसे कुछ देने का साहस किया इस बार भी वो न टुटा मेरी समझ मेँ आ गया कि वह बेघर है भिखारी नहीँ

गुरुवार, 10 मार्च 2011

परिवर्तन

युवाओँ के टोली के
समछ्,
किया भ्रष्टाचारियोँ ने
सर्मपण !!

कानोँ को छुकर ये
समीर,
कह रही हो रहा
परिवर्तन !!

हवाओँ मेँ जो थी
घुटन,
कम हो रही उसकी
तपन !!

भुखे नँगोँ को
ठिकाना,
होगा उनका भी
आशियाना !!

इतिहास अपने को
दोहराता है,
क्रान्ति के बीज हर बार
बो जाता है !!

लीबीया क्या पुरा
एशिया जल रहा,
सामाजिक ढांचे मे कुछ
परिवर्तन हो रहा !!

"दल या दलदल"

दल बना या दलदल बना,
हाथ बना हाथी बना !
सब कहते हैँ हम साथी हैँ,
क्या इतनी सी बात काफी है !!

प्यार की ताशिर लेकर,
तलवार फिर क्युँ भोंकते !
हो क्या इतने टुकडे कम हुए,
क्युँ और इसको तोडते हो !!

मिट जायेँ जो देशपर,
क्या आज एक भी दल बचे !
अपनी दाल गलती रहे,
जनता चाहे मर मिटे !!

इस राजनीति ने तो,
अध्यात्म तक को खिचाँ है !
हाय अभागे लुट रहेँ,
कहर यह कैसा बरपा है !!

चलिए इस दलदल का तो,
रंग ही निराला है !
कुछ सोचकर युँ चुप हुँ,
शायद वक्त बदलने वाला है !!

बुधवार, 9 मार्च 2011

आजादी

सब कहते हैँ कि,
आज हम स्वतंत्र हैँ !
ये आजादी तो मात्र,
उनकी है जो खेलते प्रपंच हैँ !!

आजादी के लिए जिन्होनेँ,
दी कुर्बानियाँ !
वास्तव मेँ वो तो रह गये,
बनकर कहानियाँ !!

स्वतंत्रता, गणतंत्र दिवस पर,
ध्वज फहराया जाता है !
अपनी काली करतुतोँ से,
इसको धुल चटाया जाता है !!

स्विस बैँकोँ मेँ भरकर धन,
ये स्वर्ग ले कर जायेँगे !
खाने को मिले जो इनको,
तोप से चारा तक खा जायेँगे !!

कवि "साहस" का है अनुमान,
होगा जनविद्रोह घमासान !
अंत मे छुपकर कहाँ जायेँगे,
गरिबोँ के हाथोँ निर्वाण पायेँगे !! 

जिस तरह की बयार,
विश्व मेँ चल रही !
क्या बिना छुये,
देश को निकल जाएगी !!

पुजनियोँ! अब तो सम्हल जाओ,
आजाद हो चुके हैँ हम !
हमेँ आजादी पाने को,
मजबूर न कराओ !!

सोमवार, 7 मार्च 2011

"तुम्हारा साथ"

अरमानोँ की इस अग्नि मेँ,
 रहा तुम्हारा साथ प्रिये !
 टुटकर रुठा बहुत मै तुमसे,
तुमने न छोडा साथ प्रिये !!

 मेरी एक खुशी के खातिर,
 तुमने तन मन दे डाला था!
 छलकता रहा मैँ गागर मेँ जैसे,
 तुमने मुझे उबारा था !!

 तुम "दिव्य" स्वरुप स्वामिनी,
 आँखोँ की शितलता प्रदायिनी
 ईश्वर की है विशेष अनुकम्पा,
 पर क्युँ तुमपे करता रहा शँका!!

 दामन तो दुर्भाग्य ने थामा था,
 फिर कहाँ तुम्हारा प्यार पाना था!
 आज तुम्हारे आँसु मेरी आँखो से गिरते हैँ,
 रात तो अन्जान सितारे भी डसते हैँ !!

 हाय अभागा करता हुँ निवेदना,
 आज जागी है इतनी संवेदना !
 हो सके तो इतना स्विकार करना,
 होकर मेरी मुझे तुम प्यार करना!!

 आज कोई ख्वाहिश नहीँ गुजारिश है,
 मैँ वही तुम्हारा साथ पाना चाहता हुँ !
 फिर तुम्हारे आगोश मेँ डुबना ,
हाँ वही प्यार पाना चाहता हुँ !!

नारी

इस काठ रुपी समाज ने,
सदा इसको दबाया है !
रुढ् धारणाएँ और अमानवीय सोच,
ने बहलाया-फुसलाया है !!

वो भृखी काली आँखोँ की,
सजल उत्सुक द्रष्टि !
अब देखती चहुँ ओर,
सम्मान की व्रष्टि !!

परांपरागत बंधनोँ मेँ छटपटाती नारी,
नए धरातल तलाशती है !
जड् और जकड्बन्द को त्यागकर,
अपने को सवाँरती है !!

जगतजननी नारी को कवि,
"साहस" का प्रणाम !
संघर्ष और सफलता देख,
करता अस्मिता को सलाम !!

रविवार, 6 मार्च 2011

रामराज्य का सपना

आज सुबह मैने देखा एक सपना,
 देश मेँ था सत्य का बोल बाला
 "सत्य" का ही साम्राज्य था अपना,
 मानोँ चल रही हो रामराज्य की घटना !!

 राम रुपी राजा बैठे थे पुरे होश मेँ ,
 जनता उन्मुक्त थी गा रही थी पुरे जोश मेँ !
 हम ने भी ईश्वर का धन्यवाद किया,
 राम रुपी राजा से स्नेह और आशिर्वाद लिया

 मुझे लगा अब बच्चे बेहतर शिछा पायेँगे,
 मजदूर भी रोजी रोटी कमायेँगे !
लडकियाँ भी बैखौफ घरोँ से निकलेँगी ,
 भ्रष्ट अफसरोँ पर कुछ नकेल तो कसेगी !!

माँ की ध्वनि से मेरी नीँद खुलती है ,
आँखे अनायास ही मुरझाये फुलोँ को तकती हैँ !
 अट्टालिकाओँ से मेँ खपरैल पर गिरता हुँ,
 रामराज्य का सपना गहरी स्वाँस मेँ छोडता हुँ!!