मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

"बिलबिलाता बचपन"

आज अनायास गंगा जी मे डुबकी लगाने का जी चाह दिया। नाँव मेँ बैठकर पार उतरे तो सुबह के 10 बजे होँगे। परन्तु दोस्तोँ के साथ जलक्रीडा करते हुए कब एक घन्टा बीत गया पता न चला । इतने मेँ मल्लाह ने आवाज दी "साहेब चलीँ !काम पे जाये के अहा।"
मैने पुछ लिया 'कहाँ काम करते हो,रुको थोडा और नहा लेँ।'
"बाबुजी दुर्गेश बाबु के यहाँ काम करता हुँ, देरी हो गई तो मार पडेगी"
मैँने चौँककर उससे पुछा " तुम्हारी उम्र कितनी है"?
"जी 13 साल" लडके ने बताया।

शाम को दुर्गेश बाबु मिले ,जो कि सरकारी दफ्तर मेँ कार्यरत हैँ। बातोँ ही बातोँ मेँ मैने कहा "भाई आप तो सरकारी मुलाजिम् हैँ ।बाल मजदुरी कराकर अपराध कर रहे हैँ।
दुर्गेश बाबु दांत निपोरते हुए बोले " राय साहब!मै तो उसे दो समय का भोजन और आशियाना देता हुँ। आखिर मै तो उसकी मदद करता हुँ।

आज हम सवा सौ करोड् हो चुके हैँ । विश्व की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था हमारी है। परन्तु लाखोँ बचपन ऐसेँ हैँ जिन्हेँ शिच्छा क्या भोजन तक नसीब नहीँ हो पाता है। और तो और दुर्गेश बाबु जैसे कई सरकारी मुलाजिम हैँ , जो रोटी और आश्रय देकर उनका बचपन छीन लेते हैँ। सरकार द्धारा बाल मजदुरी के खिलाफ उठाये गये कदम भी नाकाफी हैँ।

आखिरकार यह कथन भी तो भारत मेँ प्रचलित है"कानुन तो तोडने के लिए बनते हैँ"।

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