रविवार, 13 मार्च 2016

AAJ KAL JHAA DEKHIYE NUKKAD PER BAITHE RAMU SE SHAMU TAK SABKO KOI NA KOI MUDDA MIL HI GYA HAI BOLNE K LIYE KHABRO KA PURA BAJAR GARM HAI . AKHIRE SUBAH UTHTA HUN TO CHAI KI CHUSKIO K SATH JAB AKHBAAR HATH ME HOTA HAI TAB YEH SOCHTA HUN KI MERA DESH KIS AUR JA RHA HAI.KYA BHATKE BALKO KO SAMJHAYA NAHI JA SAKTA THA DESH KO CHALANE WALE KYA YEH BHUL GYE KI ANKH K BADLE ANKH SE TO SAARA SANSAR HI ANDHA HO JAYEGA.. HUMARE NETA KAHTE HAIN KI VIRODHI KAAM NAHI KARNE DE RAHE HAIN PER KYA UNHONE APNE BUJURGO SE BAAT NAHI SUNI KI HATHI CHALTA RAHTA HAI AUR BHOUNKNE WALE BHOUNKTE RAHTE HAIN.KAHI SANSKRATIK KARYAKRAMO KA VIRODH KAHI BOLNE PER PABANDI KYA LOG BHUL GYE KI YEH DESH LOKTANTRIK DESH HAI.AUR HUM LOKTANTRA K SAMARTHAK HAIN .. SATTA K MAD ME AAP YAH BHUL JATE HAIN KI AAP AAYE TO HAIN BAS 5 SAAL K LIYE.

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

जाट आंदोलन

“जाट आंदोलन” देश को बंदी बनाना किस हद तक सही है ? – लक्की राय
 आजकल देश में ख़बरों का माहौल गर्म है। मीडिया राजनेताओं एवं नुक्कड़ पर बैठे चाय की चुस्कियां लेते धीरज, बिक्कू, पिंटू और पप्पू आदि के पास गरम मुद्दों की भरमार है..

जहां एक ओर मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री हैं जो कि देश के विकास को नए आयाम दे रहे हैं। वही कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी हैं जो अपने आपको पिछड़ा साबित करने में देश की संपत्ति को नष्ट ही कर रहे हैं। “जाट आंदोलन” के कारण प्रभावित हुई शहरवासियों की जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी है, वहीं अराजक तत्वों के हटने से शहर में भीड़ भी देखने को मिल रही है, बसों में भी यात्रियों की संख्या में इजाफा हुआ है। परंतु लंबे रूट के लिए बसें अभी भी बंद है। गुड़गांव से दिल्ली जाने के लिए सिर्फ दिल्ली मेट्रो का ही सहारा है। जिला प्रशासन द्वारा सरकारी स्कूल कॉलेज बंद रखने के आदेश जारी किए गए हैं।

आंदोलनकरीयो ने ऐसा क्यों किया? और वास्तव में इसके मर्म को समझें तो सच्चाई बहुत ही भयावह नजर आती है। वास्तव में देखें तो जाट आंदोलन सिर्फ आज का मुद्दा नहीं है इसकी चिंगारी सबसे पहले 24 नवंबर 2006 को वसुंधरा गाजियाबाद में आयोजित जाट महासम्मेलन में उठी थी। और प्रत्येक वर्ष जाट महा सम्मेलन के ज़रिए आज इसने इतना भयावह रुप धारण कर लिया।

2016 तक आते आते इसने ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया, अगर सुप्रीम कोर्ट के कथन को देखें तो पाएंगे कि आरक्षण के लिए पिछड़ेपन का आधार सामाजिक होना चाहिए ना की आर्थिक या शैक्षणिक। जाट सामाजिक रूप से, आर्थिक रुप से सक्षम है और उन्हें आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है। आरक्षण केवल जाति के आधार पर ही नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यहां तक कहा कि ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण में अब तक जातियों को शामिल ही किया गया है किसी जाति को बाहर क्यों नहीं किया गया?

आरक्षण लागू होने से लेकर जनसंख्या में अनवरत वृद्धि हो रही है परंतु सरकारी पदों का सृजन कभी कभी ही हो पा रहा है, इस मुद्दे के पीछे असल लड़ाई सरकारी महकमे में प्रवेश को लेकर है, जिससे जाति के अधिक से अधिक लोग प्रवेश कर सके वस्तुतः बात यह है कि जाति का पिछड़ापन को एकमात्र आधार माना ही नहीं जा सकता है। देश के कई हिस्सों में हो रहे आरक्षण के आंदोलन शासन दबा रहा है। अगर आरक्षण के इस आग को समय रहते नही बुझाया गया और इसका सही तरह से निवारण नहि किया गया तो वह दिन दूर नही जे ये देश को विकराल विभाजन की ओर ले बढ़ेगा।

कुछ सवाल जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। तरक़्क़ी के इस दौर में जात अपने आपको क्यों पिछड़ा साबित करने पर लगे हुए हैं? क्या सिर्फ़ ही आरक्षण उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पे उनकी पहचान दिल पाएगा ? कल को और भी जातीय यही माँग करेंगी फिर क्या यही लोग उनको अनदेखा करेंगे?

क्या हम लोकतंत्र को सिर्फ़ एक मज़ाक बन के रह जाएगा, कोई भी देश को आंदोलन के मद्यम से कभी भी बंदी बना लेगा और अपनी माँगे मनवा लेगा?

हमें सोचने की ज़रूरत है।

लक्की राय

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

"बिलबिलाता बचपन"

आज अनायास गंगा जी मे डुबकी लगाने का जी चाह दिया। नाँव मेँ बैठकर पार उतरे तो सुबह के 10 बजे होँगे। परन्तु दोस्तोँ के साथ जलक्रीडा करते हुए कब एक घन्टा बीत गया पता न चला । इतने मेँ मल्लाह ने आवाज दी "साहेब चलीँ !काम पे जाये के अहा।"
मैने पुछ लिया 'कहाँ काम करते हो,रुको थोडा और नहा लेँ।'
"बाबुजी दुर्गेश बाबु के यहाँ काम करता हुँ, देरी हो गई तो मार पडेगी"
मैँने चौँककर उससे पुछा " तुम्हारी उम्र कितनी है"?
"जी 13 साल" लडके ने बताया।

शाम को दुर्गेश बाबु मिले ,जो कि सरकारी दफ्तर मेँ कार्यरत हैँ। बातोँ ही बातोँ मेँ मैने कहा "भाई आप तो सरकारी मुलाजिम् हैँ ।बाल मजदुरी कराकर अपराध कर रहे हैँ।
दुर्गेश बाबु दांत निपोरते हुए बोले " राय साहब!मै तो उसे दो समय का भोजन और आशियाना देता हुँ। आखिर मै तो उसकी मदद करता हुँ।

आज हम सवा सौ करोड् हो चुके हैँ । विश्व की तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था हमारी है। परन्तु लाखोँ बचपन ऐसेँ हैँ जिन्हेँ शिच्छा क्या भोजन तक नसीब नहीँ हो पाता है। और तो और दुर्गेश बाबु जैसे कई सरकारी मुलाजिम हैँ , जो रोटी और आश्रय देकर उनका बचपन छीन लेते हैँ। सरकार द्धारा बाल मजदुरी के खिलाफ उठाये गये कदम भी नाकाफी हैँ।

आखिरकार यह कथन भी तो भारत मेँ प्रचलित है"कानुन तो तोडने के लिए बनते हैँ"।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

Parent's

Ek choti bachhi apne Papa k sath ja rahi thi..Ek pul par paani bahut tezi se beh raha tha...
PAPA:- Beta daro mat,mera haath pakad lo.
BACHHI:-Nahi papa, aap mera haath pakad lo.
Papa (muskura kar):- Dono me kya antar hai beta..?
Bachhi:-Agar mai aapka haath pakdu aur achanak kuch ho jaye,to shayad mai aapka haath chhod du...LEKIN agar aap mera haath pakdenge, to mai jaanti hu ki chahe kuch bhi ho jaye,AAP MERA HAATH KABHI NAHI CHHODENGE..!!!
GREAT LOVE...!
Always remember ur 1st love is ur Parents..!Or whom u Trust...

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

"खत्म होगा भ्रष्टाचार"

आज सुबह मेरे भाई ने अखबार से नजर हटाकर मुझसे पुछा "क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा?" मैने पुछा पहले यह बताओ कि लोकपाल विधेयक के बारे मेँ क्या जानते हो ? छोटे ने तपाक से कहा "कुछ खिलाओ तो बताता हुँ" मैने कहा....शायद इस जन्म मेँ यह खत्म न हो सकेगा । "क्युँ" भाई ने कहा मैने समझाया ...तुमने तो शुरुआत कर दी है। उसने कहा.."आप तो घर के हैँ । ये तो दुसरी बात है। "चोर चोरी की शुरुआत अपने घर से करता है" मेरे इस कथन से माहौल खामोश सा हो गया । शायद खामोशी मेँ छोटे भाई को उत्तर मिल गया था।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

नैतिक जिम्मेदारी

अन्ना हजारे का प्रयास सराहनीय है परन्तु उनको गांधी जी के साथ तुलना करना जल्द्बाजी होगी । भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। भारत मेँ विधेयकोँ की कमी नहीँ है कानुन भी सश्क्त है ।आज एक रिक्शे वाला भी आपको तन्हाई मेँ पाता है तो लुटने का प्रयास करता है ।प्याज की किमत बढ जाने पर एक छोटा दुकानदार 10 रुपये के प्याज को बचाकर रख देता है और 60 रुपये किलो बेचता है। शुरुआत तो निचले स्तर से करनी चाहिए तभी यह संभव है। नेता तो हमारी रगोँ को पहचानकर उसके अनुरुप कार्य करता है । आजादी के बाद से भारत मेँ गैर सरकारी संगठनोँ तथा समाजसेवियोँ का अम्बार
सा लग गया है। परन्तु भ्रष्टाचार का स्तर घटने की बजाय बढ्ता ही गया है ।क्युँ? क्योँकि इन सभी जगहोँ पर नैतिक जिम्मेदारी का अभाव है।
अगर आम आदमी अपने स्तर से शुरु करे तो अवश्य ही ये विशालकाय रुपी जीव समाप्त हो जायेगा । ईन्दिरा गाँधी ने जबरन नसबन्दि कराई जिसका कि कोई सार्थक परिणाम नहीँ निकला क्योँकि जनता मेँ नैतिक जिम्मेदारी का अभाव था। आज हर वर्ग अपना परिवार छोटा चाहता है ।क्योँकि आज वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी एवँ जरुरतेँ समझता है जिसका कि 70 के दशक मेँ आभाव था ।
आज भगवान किशन रुपी उपदेश देने वाले हर गली और कुचोँ मेँ मिल जायेँगे। परन्तु अर्जुन जैसा आदेश पालक यदा कदा ही मिला करते हैँ।
"भारत अपना भ्रष्टाचार मुक्त हो जन जन का यह सपना है,
औरोँ को न देखेँ सोचेँ योगदान क्या अपना है"

बुधवार, 16 मार्च 2011

मुहल्ले की होली

साल भर बाद फिर लौट
आई होली,
लक्की धीरज चुन्नु लुड्डु ने
बनाई अपनी टोली॥

मोनु ने खरिदा गुलाल तो
सोनु को भाया रंग लाल
गौरव ने भरी पिचकारी
पापा पे ही डाल दी सारी

पान्डे जी को भी आया जोश
भाँग खाकर खो बैठे होश
राकेश से बोले होली है हुडदंग है
रंग देँगेँ सबको क्योँकि हम दबंग हैँ

इस होली का रंग निराला
दुश्मन को दोस्त बना डाला
अमित विनित जो रोज थे लडते
गले मिल आज रंग उडेलते

पुनित ललित की आइ टोली
दुर्गेश अम्बुज ने भी खेली होली
रंगोँ की फुहार मेँ
मिट गई सारी दुरी