रविवार, 28 फ़रवरी 2016

जाट आंदोलन

“जाट आंदोलन” देश को बंदी बनाना किस हद तक सही है ? – लक्की राय
 आजकल देश में ख़बरों का माहौल गर्म है। मीडिया राजनेताओं एवं नुक्कड़ पर बैठे चाय की चुस्कियां लेते धीरज, बिक्कू, पिंटू और पप्पू आदि के पास गरम मुद्दों की भरमार है..

जहां एक ओर मोदी जी जैसे प्रधानमंत्री हैं जो कि देश के विकास को नए आयाम दे रहे हैं। वही कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी हैं जो अपने आपको पिछड़ा साबित करने में देश की संपत्ति को नष्ट ही कर रहे हैं। “जाट आंदोलन” के कारण प्रभावित हुई शहरवासियों की जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी है, वहीं अराजक तत्वों के हटने से शहर में भीड़ भी देखने को मिल रही है, बसों में भी यात्रियों की संख्या में इजाफा हुआ है। परंतु लंबे रूट के लिए बसें अभी भी बंद है। गुड़गांव से दिल्ली जाने के लिए सिर्फ दिल्ली मेट्रो का ही सहारा है। जिला प्रशासन द्वारा सरकारी स्कूल कॉलेज बंद रखने के आदेश जारी किए गए हैं।

आंदोलनकरीयो ने ऐसा क्यों किया? और वास्तव में इसके मर्म को समझें तो सच्चाई बहुत ही भयावह नजर आती है। वास्तव में देखें तो जाट आंदोलन सिर्फ आज का मुद्दा नहीं है इसकी चिंगारी सबसे पहले 24 नवंबर 2006 को वसुंधरा गाजियाबाद में आयोजित जाट महासम्मेलन में उठी थी। और प्रत्येक वर्ष जाट महा सम्मेलन के ज़रिए आज इसने इतना भयावह रुप धारण कर लिया।

2016 तक आते आते इसने ज्वालामुखी का रूप धारण कर लिया, अगर सुप्रीम कोर्ट के कथन को देखें तो पाएंगे कि आरक्षण के लिए पिछड़ेपन का आधार सामाजिक होना चाहिए ना की आर्थिक या शैक्षणिक। जाट सामाजिक रूप से, आर्थिक रुप से सक्षम है और उन्हें आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है। आरक्षण केवल जाति के आधार पर ही नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यहां तक कहा कि ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण में अब तक जातियों को शामिल ही किया गया है किसी जाति को बाहर क्यों नहीं किया गया?

आरक्षण लागू होने से लेकर जनसंख्या में अनवरत वृद्धि हो रही है परंतु सरकारी पदों का सृजन कभी कभी ही हो पा रहा है, इस मुद्दे के पीछे असल लड़ाई सरकारी महकमे में प्रवेश को लेकर है, जिससे जाति के अधिक से अधिक लोग प्रवेश कर सके वस्तुतः बात यह है कि जाति का पिछड़ापन को एकमात्र आधार माना ही नहीं जा सकता है। देश के कई हिस्सों में हो रहे आरक्षण के आंदोलन शासन दबा रहा है। अगर आरक्षण के इस आग को समय रहते नही बुझाया गया और इसका सही तरह से निवारण नहि किया गया तो वह दिन दूर नही जे ये देश को विकराल विभाजन की ओर ले बढ़ेगा।

कुछ सवाल जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। तरक़्क़ी के इस दौर में जात अपने आपको क्यों पिछड़ा साबित करने पर लगे हुए हैं? क्या सिर्फ़ ही आरक्षण उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पे उनकी पहचान दिल पाएगा ? कल को और भी जातीय यही माँग करेंगी फिर क्या यही लोग उनको अनदेखा करेंगे?

क्या हम लोकतंत्र को सिर्फ़ एक मज़ाक बन के रह जाएगा, कोई भी देश को आंदोलन के मद्यम से कभी भी बंदी बना लेगा और अपनी माँगे मनवा लेगा?

हमें सोचने की ज़रूरत है।

लक्की राय